कौन हैं सोनम वांगचुक?
सोनम वांगचुक लद्दाख के एक प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता, शिक्षा सुधारक और सामाजिक जागरूकता लाने वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने SECMOL (Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh) नाम की संस्था की स्थापना की, जो लद्दाख के स्कूलों, शिक्षा प्रणाली और स्थानीय संस्कृति के बीच बेहतर तालमेल बनाने का काम करती है।

वांगचुक जलवायु परिवर्तन, शिक्षा नीति और स्थानीय स्वशासन जैसे मुद्दों पर लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। उन्होंने अपनी सोच और कार्यों से देश-विदेश में पहचान बनाई है। कई बार वे सरकार के सलाहकार के रूप में भी आमंत्रित किए गए, लेकिन वे हमेशा इस बात पर जोर देते रहे कि लद्दाख को अधिक संवैधानिक अधिकार मिलने चाहिए।
क्या हुआ — घटना का क्रम
मांगों की शुरुआत
लद्दाख के लोगों की मुख्य माँग है कि उन्हें छठी अनुसूची (Sixth Schedule) की सुरक्षा मिले और लद्दाख को राज्य (Statehood) का दर्जा दिया जाए। उनका कहना है कि इससे उनकी भूमि, जल, जंगल और संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण बना रहेगा और विकास उनके अनुरूप होगा।
इन मांगों को बल देने के लिए सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल (Hunger Strike) भी की थी, जिसे पूरे देश में समर्थन मिला।
24 सितंबर 2025 की हिंसा
24 सितंबर को लद्दाख की राजधानी लेह में शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहे थे, लेकिन अचानक कुछ हिस्सों में हिंसा भड़क गई। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हुईं, कुछ सरकारी इमारतों को नुकसान पहुँचा और एक राजनीतिक दल के कार्यालय में आग लगा दी गई।
इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। इसके बाद प्रशासन ने लेह में कर्फ्यू लगाया, इंटरनेट बंद किया और भारी सुरक्षा बल तैनात किए।
गिरफ्तारी और NSA आरोप
26 सितंबर 2025 को सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने लोगों को हिंसा के लिए उकसाया और उनकी गतिविधियाँ सार्वजनिक शांति के लिए खतरा हैं।
उन्हें जोधपुर जेल (राजस्थान) भेजा गया, और यह कहा गया कि यह कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़रूरी था।
पत्नी की याचिका और बढ़ता विरोध

सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने सुप्रीम कोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की है। उनका कहना है कि यह गिरफ्तारी अवैध है, क्योंकि न तो उन्हें औपचारिक आदेश दिखाया गया और न ही पति से मिलने दिया गया।
देशभर में कई सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों ने वांगचुक की गिरफ्तारी की निंदा की है। लद्दाख में भी कई स्थानों पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन जारी हैं।
दोनों पक्षों के तर्क
प्रशासन और सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि वांगचुक के बयानों से शांति व्यवस्था भंग होने का खतरा था। उन्होंने कुछ ऐसे वक्तव्य दिए जिन्हें “उकसाने वाला” बताया गया। इसके अलावा यह भी आरोप है कि वांगचुक ने कुछ विदेशी संगठनों और व्यक्तियों से संपर्क रखा था और उनके संस्थान पर वित्तीय अनियमितताओं की जांच भी की जा रही है।
विरोधियों और समर्थकों का पक्ष
वांगचुक के समर्थक इस गिरफ्तारी को राजनीतिक दमन बताते हैं। उनका कहना है कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण और संवैधानिक था, और सरकार ने बिना ठोस कारण के एक सामाजिक कार्यकर्ता को निशाना बनाया है।
गीतांजलि अंगमो का कहना है कि उनके पति केवल जनता की आवाज़ को लोकतांत्रिक तरीके से उठाते रहे हैं, और उन्होंने कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया।
जनता के लिए क्या समझना ज़रूरी है?
यह मामला केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं है — यह लद्दाख की पहचान और अधिकारों की लड़ाई है। लद्दाख के लोग चाहते हैं कि उनकी जमीन, संसाधन और संस्कृति को संवैधानिक सुरक्षा मिले ताकि विकास उनके हित में हो सके।
साथ ही यह घटना यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि क्या लोकतंत्र में विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किया जा रहा है? सरकार को जनता की आवाज़ सुननी चाहिए और संवाद की राह अपनानी चाहिए, जबकि आंदोलनकारियों को भी कानून और शांति का पालन करना चाहिए।
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर हैं — जो यह तय करेगा कि सोनम वांगचुक को रिहा किया जाएगा या नहीं, और क्या सरकार अपनी कार्रवाई को उचित ठहरा पाएगी।
